कवितायें

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मैं वहीँ था 


मैं वहीँ था.
चाँद के साथ छुपा,
टहनियों की आड़ में.

बाँट लेती यदि तुम दृष्टि मेरी,
न रात इतनी अँधेरी लगती.

जिस सहेजे हुए दस्तावेज़ को
बार-बार पढ़ते हुए
आकाश को ताका तुमने,
मैं वहीँ था
कागज़ पर - बादलों में,
तुम्हारे अंक में लिपटा.

समझ पाती यदि तुम व्यंग्य रात का,
न शब्द इतने उदास लगते.

कल्पना में जहाँ
रच रही थी तुम अपना विस्तार
ईंट-पत्थरों, स्वप्नों से,
मैं वहीँ था
खुद को समेटे
यथार्थ के बिखरते शिखर पर.

छोड़ आती यदि तुम वो दुनिया,
न प्रश्न मेरे पराये लगते.









    * * *





नास्तिक की अर्चना


हो कहाँ खड़े वैरागी मन,
भूखे-प्यासे ठोकर खाए,
सपनों की टूटी माल लिए,
कितने कस्बे होकर आए



किस डाली पे आखर-आखर
शब्दों की लता सजाते तुम,
दुनिया के तीरथ में मलंग
किसका बचपन खोकर आए



भागे-फ़िरते जिस जीवन से,
उसको ही पाने को व्याकुल
मन में ऐसा तुम द्वंद्व लिए
डूबे मद में क्या कर पाए



स्वीकार करो दुविधा अपनी
अब गले लगा इस मोह को
हो सके कोई भटकी आशा
स्मृति से धूल हटा जाए



हो जहाँ खड़े वैरागी मन,
बस एक कदम उससे आगे,
साक्षात प्रेम की प्रतिमा वो
जो स्पर्श करे मृत जी जाए




आ चुका समय हो जाने का
नतमस्तक अब इसके आगे
लेकर विराम मन के मंदिर 
जो सब खो दे वो सब पाए



    * * *



कीड़े की कविता

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में
जन्म होता है एक गंदे कीड़े का 
  
महानगर के नालों से
रेंगता हुआ कॉकरोच
मध्यमवर्ग की रसोई
में घुसता है 
तंग कमरों में
गुमनामी काट रहे
सामानों के बीच
अड्डे जमाता है
और चप्पलों से बचते-बचाते
अपने निरर्थक जीवन
के लिए चारा खोजता है 
परिवार की दरारों में छुपकर
कीड़ा ताकतवर इंसानों की
बेबसी देखता है 

कीड़ा जवान होता है, 
प्रेम करता है
और वंश आगे बढ़ाता है 

पहाड़ों, नदियों और प्रकृति के
रंगों से दूर कीड़ा
मनुष्यों की आबादी में
उनकी ही तरह जूझना चाहता है

सड़ी-गली चीज़ों में आनंद की
तलाश करता कीड़ा
अपनी स्मृतियों का नक्शा
बनाना चाहता है
और फिर-से गुज़रना चाहता है
अपने छोटे से इतिहास की
संकरी गलियों से

नाले, 
रसोई की जूठन, 
अलमारियों के ख़ुफ़िया ठिकाने
और झाड़ू की मार, 
सब एक बार फिर से
जी लेना चाहता है कीड़ा
अंतिम बार उलटने से पहले