सभ्य लोग सड़क पे नहीं सोते
चिढ़ते हैं सड़क से।
जो वहाँ सोते हैं
वे सभ्य नहीं।
सड़क गंदगी का पर्याय है।
सड़क ख़तरनाक है।
अँधेरी रात में
बेघर औरत है सड़क।
सड़क अजीब-सा सत्य है।
अलग है
सभ्यता के कमरों में क़ैद
विश्वसनीय झूठों से।
धूप, बारिश, कीचड़, गुंडे -
सड़क पे बहुत ज़ोखिम हैं।
फिर भी -
वे कोसते थे संसद को
जब वो दूर थी सड़क से।
वही सभ्य लोग
खिड़कियों से झांकते हुए
बुदबुदा रहे हैं -
संसद कबसे आने लगी
सड़क पे?
सड़क तो हमारी है
सभ्य लोगों की।
सड़क ऊब चुकी है
करवट लेने वाली है अब।
चिढ़ते हैं सड़क से।
जो वहाँ सोते हैं
वे सभ्य नहीं।
सड़क गंदगी का पर्याय है।
सड़क ख़तरनाक है।
अँधेरी रात में
बेघर औरत है सड़क।
सड़क अजीब-सा सत्य है।
अलग है
सभ्यता के कमरों में क़ैद
विश्वसनीय झूठों से।
धूप, बारिश, कीचड़, गुंडे -
सड़क पे बहुत ज़ोखिम हैं।
फिर भी -
वे कोसते थे संसद को
जब वो दूर थी सड़क से।
वही सभ्य लोग
खिड़कियों से झांकते हुए
बुदबुदा रहे हैं -
संसद कबसे आने लगी
सड़क पे?
सड़क तो हमारी है
सभ्य लोगों की।
सड़क ऊब चुकी है
करवट लेने वाली है अब।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


No comments:
Post a Comment