साहित्य की सभी विधाओं का अपना सौंदर्य और प्रारूप होता है और कोई भी लेखक लिखते समय इन्ही मूल्यों के इर्द-गिर्द अपनी रचनाशीलता को रंग-रूप देने की कोशिश करता है। लेकिन इन मानदंडों की खोज में लेखक का ध्यान, साहित्य की जो बुनियादी भूमिका समाज में होनी चाहिए, उससे हट कर कलावादी शैलियों और प्रयोगों में लीन रह गया है। मैं व्यग्तिगत तौर पर ये मानता हूँ कि हिंदी साहित्य का दौर अब जा चुका है लेकिन अपनी पीढ़ी के और साहित्यप्रेमियों की ही तरह खुद को लिखने से रोकने का साहस नहीं कर पाता हूँ। इसका कारण संभवतः यही है कि हमारे अन्दर एक दबा हुआ विश्वास है जो इस भावना से प्रेरित है कि कोई भी कला कमज़ोर पड़ सकती है लेकिन मृत नहीं हो सकती। इस ब्लॉग पर मैं नियमित रूप से अपनी रचनायें प्रकाशित करता रहूँगा और कोशिश करूंगा कि पाठक से एक लेखक की बजाय एक मित्र की तरह पेश आऊँ।
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