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सड़क का सच

Filed Under () by Amit Kumar on Tuesday, January 21, 2014

Posted at : 12:07 PM

सभ्य लोग सड़क पे नहीं सोते
चिढ़ते हैं सड़क से।
जो वहाँ सोते हैं
वे सभ्य नहीं।

सड़क गंदगी का पर्याय है।
सड़क ख़तरनाक है।
अँधेरी रात में
बेघर औरत है सड़क।

सड़क अजीब-सा सत्य है।
अलग है
सभ्यता के कमरों में क़ैद
विश्वसनीय झूठों से।

धूप, बारिश, कीचड़, गुंडे -
सड़क पे बहुत ज़ोखिम हैं।

फिर भी -
वे कोसते थे संसद को
जब वो दूर थी सड़क से।

वही सभ्य लोग
खिड़कियों से झांकते हुए
बुदबुदा रहे हैं -
संसद कबसे आने लगी
सड़क पे?
सड़क तो हमारी है
सभ्य लोगों की।

सड़क ऊब चुकी है
करवट लेने वाली है अब।

आरम्भ

Filed Under () by Amit Kumar on Wednesday, March 31, 2010

Posted at : 6:33 AM

साहित्य की सभी विधाओं का अपना सौंदर्य और प्रारूप होता है और कोई भी लेखक लिखते समय इन्ही मूल्यों के इर्द-गिर्द अपनी रचनाशीलता को रंग-रूप देने की कोशिश करता है। लेकिन इन मानदंडों की खोज में लेखक का ध्यान, साहित्य की जो बुनियादी भूमिका समाज में होनी चाहिए, उससे हट कर कलावादी शैलियों और प्रयोगों में लीन रह गया है। मैं व्यग्तिगत तौर पर ये मानता हूँ कि हिंदी साहित्य का दौर अब जा चुका है लेकिन अपनी पीढ़ी के और साहित्यप्रेमियों की ही तरह खुद को लिखने से रोकने का साहस नहीं कर पाता हूँ। इसका कारण संभवतः यही है कि हमारे अन्दर एक दबा हुआ विश्वास है जो इस भावना से प्रेरित है कि कोई भी कला कमज़ोर पड़ सकती है लेकिन मृत नहीं हो सकती। इस ब्लॉग पर मैं नियमित रूप से अपनी रचनायें प्रकाशित करता रहूँगा और कोशिश करूंगा कि पाठक से एक लेखक की बजाय एक मित्र की तरह पेश आऊँ।